Guru is the ultimate Brahma.
भारतीय संस्कृति और सभ्यता में गुरु का विशेष महत्व है,कहा जाता है कि गुरु बिन मोक्ष अप्राप्त है,कठिन होता है,अलभ्य होता है।आखिर भारतीय वैदिक शैली क्यों गुरु शिष्य परंपरा की पक्षधर रही है आइये समझते हैं।सर्व प्रथम तो सवाल यह है कि आखिर गुरु की आवश्यकता क्यों?इस सवाल का सीधा सरल जवाब यह है कि शिष्य के लिए गुरु उस माता की तरह है जो जन्म के पश्चात बच्चे को लौकिक जगत से परिचय करवाती है,ठीक उसी तरह जैसे गुरु अपने शिष्य का परिचय परलौकिक जगत से करवाता है,परमात्मा से करवाता है।यदि सद्गुरु न हों तो व्यक्ति केवल लौकिक जगत तक ही सीमित रह जायेगा।गुरु व्यक्ति को यह समझ देता है कि देह बुद्धि से परे जो तत्व् है जिसे हम आत्मा कहते हैं वही ईश्वर का अंश है और वह अंश प्रत्येक मनुष्य में है जिसे हम जीवन या शक्ति कहते हैं।इसीलिए हम सभी जीवों में ईश्वर के दर्शन करने हेतु प्रेरित होते हैं।हमारी सनातन संस्कृति सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः के लक्ष्य पर आधारित है।हमारे यहाँ वैदिक काल से ही गुरुकुल में विद्या अर्जन की परंपरा रही है,जिसका मंतव्य केवल एक मात्र यही था कि प्रत्येक शिष्य को गुरु से ज्ञान प्राप्त हो,समय के साथ गुरुकुल परंपरा विलुप्त हुई जिस से समाज की हानि आज हम देख सकते हैं।आज समाज में मानसिक अस्थिरता का भयावः दौर चल पड़ा है,मानसिक स्तर पर व्यक्ति आज इतना अशुद्ध हो चुका है कि बड़ी से बड़ी पढ़ाई कर के भी उसकी मानसिक चेतना अविकसित रह गई है।लोग डिप्रेशन जैसी बीमारियों से घिरे हैं निराश हैं और इस का एक प्रमुख कारण है मानसिक दुर्बलता।अब प्रश्न यह उठता है कि इस मानसिक दुर्बलता का अंत कैसे किया जाये?उत्तर बिल्कुल सरल है एक योग्य संत समागम कीजिये केवल उनकी वाणी के ओज के प्रभाव से ही आपको एक नवल राह दिखने लगेगी।संतों को ऐसे शिक्षक समझिये जिन्हें बिगड़ैल से बिगड़ैल बुद्धि को ठीक करने में महारत हासिल है,वे चरित्र पर कार्य करते हैं हाँ आज की पढ़ाई की तरह पेपर वर्क नहीं दिखता पर मेन्टल हेल्थ पर उनकी छाप ज़रूर दिखती है।मेरी बात यदि आपको गंभीर न लगे तो खुद ही एक सर्वे भी कर लीजिये वे जिनके जीवन में एक संत का संग है मापिये उनकी हर दिशा और दशा को आपको बहुत कुछ मिलेगा जो साधारण नहीं हो सकता केवल और केवल सदगुरुदेव की कृपा का स्वरूप है।आज समाज की जो दशा है,जो दिशा हीनता है,जो कलूषिता है,जो ढोंग,पाखंड है उसे केवल सद्गुरु के निर्मल सानिध्य से मिटाया जा सकता है।अब सवाल यह उठता है कि गुरु का चुनाव कैसे करें?इसका उत्तर सिर्फ यही है,गुरु के चुनाव में कभी भी किसी का अनुसरण न करें,न ही कोई जल्दबाज़ी करें, केवल और केवल हृदय की सुनें और जहाँ मन मस्तिष्क दोनों ही अपनी शरणागति दें वही अपना शीश झुकायें,वहीं सद्गुरु को अपना सर्वस्व समर्पित करें।आज गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर मेरी कलम केवल और केवल गुरु वंदन की महिमा से परिपूर्ण है,लेख तब तक अधूरा है जब तक गुरु समर्पण का भाव न जगा सकूँ,और भाव हेतु सदगुरुदेव के चरण कमलों में वंदन प्रेषित करती हूँ।

श्री गुरु वंदन
गुरुवर मेरी लड़ाई का बल आप हैं,
मैं हर स्वांस लड़ती हूँ भीतर के,
अहंकार से,
जड़ता से,
मूढ़ता से,
विकारों से,
और अपनी देह बुद्धि से।
मेरी शांति का बल भी आप हैं,
मैं क्लेशों मे,
विकारों में,
आलाप में,
संताप में,
शांत हूँ,स्थिर हूँ।
मेरी ऊर्जा का स्त्रोत आप ही,
मंत्र में,
जाप में,
क्रिया कलाप में
संकल्प में
मैं ऊर्जित हूँ,मौन हूँ।
मेरी विनती है आपसे गुरुवर
कृपा कीजिये
करुणा दीजिये
शक्ति दीजिये,
रक्षा कीजिये,
मेरी जड़ता मिटा चेतना दीजिये।
गुरुवर मेरी विनम्र प्रार्थना बस यह,
सर्वत्र कृपा हो,
सर्वत्र चेतना,
प्रकाशमय भक्ति,
अलौकिक तेजमयी हो,
मेरा परिवार और समस्त संसार।
कविता शर्मा
घरघोड़ा



