पुसौर
कांस्य नगरी पुसौर जो पिछले कई वर्शो से अब षिक्षा का हब बन चुका है वहीं इसके दषकों पहले पुसौर संस्कृति का भी हब है जिसका कि अनुसरण लोग करते रहे हैं। रामलीला, रामसप्ताह से हटकर यहां के लोग प्रत्येक पुण्यमास में अपनी धार्मिक गतिविधियों का इस तरह प्रदर्षन करते रहे हैं जिससे पुसौर को संस्कृत नगरी संज्ञा मिलती रही है। चलित कार्तिक माह भर यहां के मातृषक्तियां लगभग 5 बजे सुबह से बाजा गाजा के साथ संकीर्तन करते हुये लोगों के कानों में भगवान का नाम पहुंचाये हैं वहीं ये अपने तुलसी चैंरा में रंगोली तैयार कर मां तुलसी देवी का भी पुजा अर्चना किये हैं। इस प्रकार समुचा माह भर इनका कार्यक्रम रहा है। इस अवसर पर पुर्णिमा के सुबह नवयुवकों द्वारा गठित कीर्तन पार्टी नगर के सभी वार्डो में घुम घुम कर भक्तिमय वातावरण देने का भी प्रयास किया। जगन्नाथ मंदिर में इस अवसर पर अनंतमुखी भागवत् पाठ का आयोजन पिछले कई वर्शो से होता हुआ आ रहा है जिसे कुछ वर्श पुर्व प्रायः पुरूश वर्ग सामने आकर इसे संपन्न कराते थे लेकिन आज के स्थिति में उडीया पढने लिखने की संख्या कम होने की वजह से यहां के संकीर्तन करने वाली मातृ षक्तियां इसे संपन्न कराया।




