प्रोफेसर गुणेश्वर झा का निधन अपूरणीय क्षति*
अघोर गुरु पीठ ट्रस्ट बनोरा की नींव के लिए रखी गई प्रथम ईंट के साक्षी रहे गुणेश्वर झा का जीवन अघोर पंथ की जड़ों को मजबूत करने हेतु समर्पित रहा।जीवन के अंतिम क्षणों तक वे बनोरा आश्रम की गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल रहे।शासकीय सेवा से रिटायरमेंट के पश्चात प्रोफेशर गुणेश्वर झा ने अपने जीवन का पल पल सेवा कार्यों के लिए समर्पित कर आने वाली पीढ़ी के एक आदर्श मिथक स्थापित किया कि मानव सेवा में लगे हुए व्यक्ति मस्तिष्क कभी रिटायर नहीं हो सकता। बनौरा आश्रम की नीव से जुड़े प्रोफेसर साहब ने आश्रम के विचारों अघोर साहित्य के प्रचार प्रसार में महती भूमिका निभाई।
आश्रम में सामूहिक पूजन हवन से लेकर रीति नीति बनाने के उनकी सक्रिय भागीदारी रही।
अघोर पंथ के संबंध में रुचि रखने वाले को प्रोफेसर झा ने एक माले में पिरोया साथ ही उन्हें प्रेरित भी करते रहें । सेवा भावी गतिविधियों के समर्पण से उन्होंने रायगढ़ अंचल से जुड़े सभी अनुयायियों के हृदय में अमिट छाप छोड़ी। वर्ष 1941 के फरवरी माह की 26 तारीख को मिथिलांचल के ग्राम बरहा में पंडित सुवंश झा और महाकाली देवी के यहाँ चौथे संतान के रूप में गुणेश्वर झा का जन्म हुआ।माता पिता के कुल देवी ज्वालामुखी में अटूट भक्ति , त्याग की भावना और शिक्षा के प्रति आकर्षण की वजह से बालक गुणेश्वर में संस्कारों का बीजारोपण हुआ। तहसीलदार पिता के साथ मिथिला के विभिन्न क्षेत्रों में उनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई । मिथिला की माटी से वे जीवन पर्यन्त जुड़े रहे। ग्रामीण जीवन से उनका अनुराग जीवन पर्यन्त बना रहा। 14 से 20 वर्ष की आयु तक अपने अग्रज के साथ पटना में विश्वविद्यालय तक की शिक्षा ग्रहण की । शिक्षा पूरी होने के बाद भारत सरकार ने भू-गर्भ शास्त्री के रूप में पंजाब के भाकड़ा – नांगल बांध का कार्य भार सौंपा। एक वर्ष पश्चात् 1962 में वे पहले राँची महाविद्यालय और बाद में राँची विश्वविद्यालय में भूगर्भ शास्त्र के व्वाख्याता के रूप में पदस्थापित हुए । महज 40 वर्ष की उम्र में बिहार – झारखंड के सबसे युवा प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष बन गए । दो दशकों तक सन् 2002 तक संस्थान को गरिमा दिलाने में पूरी ऊर्जा लगा दी l राँची विश्वविद्यालय सहित अनेक शैक्षणिक व शोध संस्थानों में झा बाबा प्रेरणा के रूप में मौजूद हैं। गुणेश्वर झा का जीवन शैक्षणिक , समाजिक और आध्यात्मिक विकास की त्रिवेणी का संगम रहा । उनकी इच्छा थी कि हर मनुष्य को इस संगम में डुबकी अवश्य लगानी चाहिए। अस्सी के दशक के दौरान ब्रह्मलीन अघोरेश्वर भगवान राम का सान्निध्य मिला और यही ये उनके जीवन में अघोर पंथ के विचार का प्रवाह धीरे धीरे शुरू हुआ। दीक्षा के जरिए मिला गुरु मंत्र झा जी के जीवन की सबसे बड़ी अमूल्य पूंजी रही जिसे उन्होंने आजीवन सम्भाल कर रखा।
झा जी पूरे जीवन गुरु मंत्र और गुरु वाणी को ही गुरु का स्वरूप समझ कर उसे अपने व्यवहारिक जीवन में अमल में लाते रहे ।भले ही शरीर रूप में गुरु उनके समक्ष मौजूद ना रहे हो।1964 के दरम्यान उनका विवाह समृद्ध परिवार की बेटी वीणा झा से हुआ। गुणेश्वर झा जी के जीवन वीणा को उनकी पत्नी ने सही मायने में झंकृत कर दिया।जीवन पथ पर हर कदम में साथ निभाने वाली पत्नी वीणा सौम्य स्वभाव, त्याग एवं सेवा भाव की वजह से संतों की कृपाशील बनीं । पूज्य अघोरेश्वर के बाद ही 1982 के दौरान गुणेश्वर झा जी की मुलाकात अघोरेश्वर की गहन साधना में लिप्त नवयुवक मुड़िया साधु महान संत बाबा प्रियदर्शी राम से हुई। अघोरेश्वर की समाधि के पश्चात प्रोफ़ेसर साहब ने बाबा प्रियदर्शी राम जी में ही अघोरेश्वर के जीवन दर्शन को महसूस किया। पूज्य पाद प्रियदर्शी के सानिध्य के बाद जीवन के अंतिम सांसों तक प्रोफेसर झा ने अघोर दर्शन को महसूस किया अपने जीवन सफर को सुगम बनाने के लिए झा बाबा ने अपने विचारों में अघोर पंथ को आत्म सात कर लिया। झा बाबा ने पूज्य प्रियदर्शी राम के बताए जीवन सूत्र को अपने जीवन में उतार लिया । यदि मनुष्य के अंदर सहजता, सरलता और आचरण की पवित्रता बनी रहेगी तो अघोर मार्ग एक सुगम मार्ग होगा। अघोर पंथ की इसी आदर्श विचार धारा को जन साधारण के अनुकूल बनाने के लिए प्रोफेसर झा जीवन पर्यन्त प्रयासरत रहे ।पूज्य अघोरेश्वर एवं पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी के आशीर्वचनों का अध्ययन कर उसमें से समय परिस्थिति के अनुकूल विचारों वाणियों का लघु संग्रह कर उसे प्रकाशित करना एवं हर वर्ष अघोर गुरु पीठ ट्रस्ट बनोरा होने वाले गुरु पूर्णिमा के अवसर पर उपलब्ध कराना उनके जीवन का सराहनीय एवं महत्वपूर्ण उद्यम रहा । प्रोफेसर झा द्वारा रचित गीत आज भी बाबा बनोरा स्थित विद्यालय में प्रार्थना के रूप में प्रतिदिन बच्चों द्वारा गाया जाता है। बनोरा आश्रम के प्रति उनके समर्पण की वजह से स्थानीय लोगों से उनके संबंध आत्मीय रहे और वे सभी के मध्य झा बाबा और आचार्य के संबोधन से स्थापित हो गए थे। वे अक्सर कहा करते थे कि पूज्य बाबा प्रियदर्शी की कृपा उनके जीवन की आध्यात्मिक पूंजी है। यह अनमोल पूंजी उनके जीवन के हर कठिन परिस्थिति में सबसे बड़ी शक्ति भी बनी रही। सादा जीवन उच्च विचार का जीवन जीते हुए झा बाबा के गृहस्थ
शैक्षणिक , प्रशासनिक , समाजिक जीवन के साथ आश्रम की सेवा में, संसाधनों की कमी कभी बाधक नहीं बनी। वे इस बात का हुनर जानते थे कि साधनों का संबंध मनुष्य की खुशी से नहीं है बिना साधनों के खुश रहने की अदभुत विद्या वे जानते थे। गुरु पर अगाध आस्था के जरिए उन्होंने अपनी वैचारिक शक्ति को मजबूत बनाया। परस्पर सहयोग की भावना से वे सभी को साथ लेकर चलने में विश्वास रखते थे। बड़ों को सम्मान छोटो से प्यार उनके जीवन का आधार भूत सिद्धांत रहा। मिथिलांचल में जन्में झा बाबा खुद को माँ जानकी के संतान के रूप में देखते थे। मैथिली भाषा और संस्कृति को वह देश के लिए एक सुन्दर भेंट समझते थे और बदलते परिवेश के अनुसार इसके प्रचार प्रसार में जीवन पर्यन्त लोगों को प्रेरित करते रहे। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनकी संतान उनकी तरह आजीवन संत प्रियदर्शी राम जी के मार्गदर्शन में जीवन सफर तय करे उनका एक सन्देश है एको देव,एक धर्म: एक निष्ठा परम तप:

*शासकीय सेवा का सफर*
प्रो गुणेश्वर झा रांची विश्वविद्यालय के भूगर्भशास्त्र विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष और विज्ञान संकाय के डीन भी रहे ।
तलछटी पेट्रोलॉजी के साथ-साथ जीवाश्म विज्ञान में उनकी विशेषज्ञता रही। 1982 से 2002 तक रांची विश्वविद्यालय के भूगर्भशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष के रूप में दो दशक का सबसे लंबा सफल कार्यकाल पूरा किया। इस दौरान प्रो झा रांची विवि स्नातकोत्तर भूगर्भशास्त्र विभाग के 27 फरवरी 1982 से 30 जून 2002 तक अध्यक्ष रहे। 26 फरवरी 1941 को जन्मे प्रो झा रांची विवि में युवा प्रोफेसर के रूप में जाने जाते थे। ये रांची विश्वविद्यालय सिंडिकेट और सीनेट के सदस्य भी थे। उन्होंने पटना के साइंस कॉलेज से एमएससी की डिग्री ली थी।
*निधन पर शोक*
रांची विश्वविद्यालय के भूगर्भशास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ उदय कुमार, डॉ बी आर झा, डॉ पी के वर्मा सहित बहुत से प्राध्यापकों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए शिक्षा जगत के लिए अपूरणीय क्षति निरूपित किया। बाबा विद्यापति स्मारक समिति के कार्यालय में एक शोकसभा भी आयोजित कर उनके योगदान का स्मरण किया गया। शोकसभा में उनकी आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन रखकर भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई।बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ जगन्नाथ मिश्रा के निकट संबंधी रहे प्रोफेसर झा का निधन सम्पूर्ण मिथिला समाज के लिए अपूरणीय क्षति है। झा को श्रद्धांजलि देनेवालों में समिति के अध्यक्ष जयन्त झा, देवेंद्र ठाकुर, मुकेश झा शास्त्री, डॉ पंकज राय, उदित नारायण ठाकुर, ज्ञानदेव झा, मृत्युंजय झा, अशोक पांडे, आशु झा शामिल रहे।
*स्थित विसर्जन के साक्षी बने रायगढ़ के साथी*
अनिल बाबा के आश्रम के नजदीक गंगा में जब झा बाबा के पुत्र अविनाश ने अस्थियों को विसर्जित किया तब रायगढ़ से बनारस गए मदन जी दिनेश जी जगदीश जी राठौर जी प्रकाश जी की आँखें नम हो गई। ये सभी साथी बनोरा आश्रम की नींव से अब तक तीन दशकों तक जुड़े रहे। रायगढ़ बनोरा में संस्था की नींव से लेकर लगभग तीन दशकों तक साथ रहे झा बाबा के जाने का दुख रायगढ़ में उनके साथियों को भी है। अघोर गुरु पीठ ट्रस्ट बनोरा की ओर से ये साथी रांची उनके निवास पर गए और शोक व्यक्त किया।
*अघोर गुरु पीठ ट्रस्ट बनोरा ने प्रोफसर झा को दी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि*
अघोर गुरु पीठ ट्रस्ट बनोरा के निर्माण से जुड़े प्रोफेसर गुणेश्वर झा के निधन पर संस्था द्वारा जारी शोक संदेश में कहा गया कि नश्वर संसार में मृत्यु अटल सत्य है जिसे टाला नहीं जा सकता । जो आया उसका जाना निश्चित है लेकिन जाने के पहले कुछ कार्य ऐसे करने चाहिए जिसका लाभ समाज राष्ट्र को मिल सके। प्रोफेसर झा लम्बे समय तक शासकीय सेवा देने के बाद अपना शेष जीवन बनोरा आश्रम के लिए समर्पित किया। संस्था के प्रति उनका आत्मीय समर्पण सदैव अविस्मरणीय रहेगा। उनका जीवन विद्या, साधना और सेवा की त्रिवेणी का संगम रहा। परम पूज्य अघोरेश्वर एवं पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी के प्रति दशकों तक झा बाबा का समर्पण रहा। बनोरा आश्रम से उनका गहरा आत्मीय जुड़ाव रहा।अघोरेश्वर भगवान राम जी के आशीर्वचनों का संकलन अघोर पंथ से जुड़े साधकों के लिए अमूल्य धरोहर हैं। इस विद्वान अध्यापक ने अज्ञानता के अंधकार को ज्ञान के प्रकाश से दूर करने का शाश्वत प्रयास किया। एक सच्चे साधक के रूप में वे आजीवन लोकमंगल और आत्मोन्नति के मार्ग पर अग्रसर रहे। संस्था ने दिवंगत आत्मा को कोटिशः श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अघोरेश्वर महाप्रभु से उन्हें अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करने की प्रार्थना की है।




