These are not corpses, they are living voices – these people are fighting to save their land.
धरमजयगढ़ क्षेत्र के सात गांवों के करीब 600 ग्रामीण, जिनमें महिलाएं, बुजुर्ग और छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल हैं, दोपहर करीब 1 बजे से कलेक्ट्रेट कार्यालय के सामने भूखे-प्यासे खुले आसमान के नीचे बैठे हैं। इनकी एक ही मांग है – पुरूँगा कोल ब्लॉक से जुड़ी जनसुनवाई को रद्द किया जाए। ग्रामीणों का कहना है कि वे सिर्फ जिला कलेक्टर से मिलकर अपनी बात रखना चाहते हैं, लेकिन अफसोस कि अब तक कलेक्टर साहब मिलने नहीं पहुंचे। सवाल उठता है – आख़िर ऐसी कौन-सी मजबूरी है जो जिले का मुखिया अपने ही लोगों की आवाज़ सुनने से बच रहा है? अगर कोई संवेदनशील होकर इनसे एक बार मिल ले, इनकी पीड़ा समझ ले, तो शायद यह शांतिपूर्वक अपने घर लौट जाएं। लेकिन मौजूदा हालात ये हैं कि जिसके भीतर इंसानियत बाकी है, वह इन तस्वीरों को देखकर भीतर तक हिल जाता है, और जिसकी संवेदनाएं मर चुकी हैं, वह इन खबरों को पढ़कर भी मौन रहता है। ठंडी रात में खुले आसमान के नीचे बैठे ये आदिवासी ग्रामीण अपनी धरती, अपनी माँ जैसी भूमि को बचाने की जंग लड़ रहे हैं। लेकिन दुख इस बात का है कि सत्ताधारी दल का एक भी प्रतिनिधि इनका दर्द बाँटने नहीं पहुंचा। यही है रायगढ़ की असली असली सच्चाई..






