नई दिल्ली: न्यायिक प्रक्रियाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते और अनियंत्रित उपयोग पर देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद गंभीर चिंता जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) और नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) द्वारा दिए गए आदेशों को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। अदालत ने पाया कि ये न्यायिक आदेश AI द्वारा तैयार किए गए पूरी तरह से ‘काल्पनिक और मनगढ़ंत’ फैसलों पर आधारित थे।
भोपाल गैस त्रासदी से की तुलना: ‘मिथाइल आइसोसाइनेट’ जैसा खतरा
जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने इस मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए इसकी तुलना 1984 की ‘भोपाल गैस त्रासदी’ से की। माननीय जजों ने कहा:
“AI द्वारा परोसी जा रही यह काल्पनिक जानकारी न्याय व्यवस्था के लिए ‘मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव’ जैसी है। यदि इस पर तुरंत नियंत्रण नहीं पाया गया, तो यह न्यायपालिका में एक अदृश्य विनाश को निमंत्रण देने जैसा होगा।”

क्या था पूरा मामला? (बैंक लोन और दिवालिया प्रक्रिया)
• लोन और गारंटी: जम्मू-कश्मीर बैंक ने ‘पैन इंडिया यूटिलिटीज’ नामक कंपनी को 200 करोड़ रुपये का कर्ज दिया था। इस कर्ज के लिए ‘एस्सेल इंफ्राप्रोजेक्ट्स लिमिटेड’ ने कॉरपोरेट गारंटी दी थी।
• बकाया राशि: लोन के 87.43 करोड़ रुपये बकाया होने पर बैंक ने एस्सेल इंफ्राप्रोजेक्ट्स के खिलाफ दिवालिया (Insolvency) प्रक्रिया शुरू करने के लिए आवेदन किया।
• ट्रिब्यूनल का फैसला: NCLT ने अगस्त 2024 में दिवालिया कार्यवाही को हरी झंडी दी, जिसे बाद में सितंबर 2025 में NCLAT ने भी सही ठहराया था।
ऐसे खुला AI की ‘जालसाजी’ का राज
सुप्रीम कोर्ट में एस्सेल इंफ्राप्रोजेक्ट्स की ओर से पेश हुईं वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि दोनों ट्रिब्यूनल्स ने अपने फैसलों में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) और ICICI बैंक से जुड़े जिन 6 अदालती फैसलों (Precedents) का हवाला दिया था, वे वास्तव में कभी हुए ही नहीं थे।
वे सभी छह केस पूरी तरह से किसी AI टूल द्वारा मनगढ़ंत तरीके से गढ़े गए थे (तकनीकी भाषा में जिसे AI Hallucination कहा जाता है)। इस पर बैंक के वकीलों ने भी साफ किया कि उन्होंने अपनी दलीलों में कभी इन मामलों का जिक्र नहीं किया था, बल्कि ट्रिब्यूनल ने खुद आदेश लिखते समय AI की मदद ली और इसे दर्ज कर लिया।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: ‘ज़ीरो टॉलरेंस’
सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों ट्रिब्यूनल के फैसलों पर कड़ी नाराजगी जताते हुए उन्हें निरस्त कर दिया है और मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस NCLT को भेज दिया है। कोर्ट ने साफ किया कि:
1. शून्य सहिष्णुता: न्यायिक आदेशों में इस तरह के मनगढ़ंत और काल्पनिक आधारों को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
2. इंसानी निगरानी अनिवार्य: न्याय व्यवस्था में AI की सहायता लेने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, लेकिन अंतिम निर्णय और तथ्यों की जांच में इंसानी दिमाग (Human Oversight) का होना अनिवार्य है।
3. विशेषज्ञ समिति का निर्देश: सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को निर्देश दिया है कि वह कानूनी क्षेत्र में AI के प्रभाव और इससे पैदा होने वाली चुनौतियों का अध्ययन करने के लिए तुरंत एक विशेषज्ञ समिति का गठन करे।



