Home Blog सहकारी समितियों में उपलब्धता से किसानों को मिल रही सुविधा

सहकारी समितियों में उपलब्धता से किसानों को मिल रही सुविधा

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  • नैनो डीएपी और नैनो यूरिया से घटी लागत, बढ़ा मुनाफा, किसानों ने बताया लाभकारी अनुभव
  • बीज उपचार से लेकर फसल वृद्धि तक असरदार साबित हो रहे नैनो उर्वरक

रायगढ़, 10 जुलाई 2026 खरीफ सीजन में रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने के लिए सहकारी समितियों के माध्यम से उपलब्ध कराए जा रहे नैनो डीएपी और नैनो यूरिया किसानों के लिए लाभकारी साबित हो रहे हैं। किसानों का कहना है कि इन उत्पादों के उपयोग से जहां उर्वरकों पर होने वाला खर्च कम हुआ है, वहीं फसल की गुणवत्ता और उत्पादन में भी सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं।
ग्राम उसरौट के किसान नरेश कुमार पटेल ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने ग्रीष्मकालीन धान में नैनो डीएपी का प्रयोग किया। इसके परिणामस्वरूप खेत में पारंपरिक मात्रा की तुलना में आधी डीएपी डालने के बावजूद धान में अधिक कंसे, मजबूत तने और बेहतर वृद्धि देखने को मिली। वहीं नैनो यूरिया के उपयोग से यूरिया पर होने वाला खर्च लगभग 50 प्रतिशत तक कम हो गया। उन्होंने कहा कि दोनों तरल उर्वरकों के उपयोग से खेती की लागत घटी है और किसानों का लाभ बढ़ा है। नरेश कुमार पटेल ने कहा कि इस वर्ष पारंपरिक उर्वरकों की कमी के बीच भी नैनो डीएपी और नैनो यूरिया की उपलब्धता सुनिश्चित किए जाने से किसानों को बड़ी राहत मिली है। इसके लिए उन्होंने राज्य सरकार तथा मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त किया।
बता दें कि सहकारी समितियों में इन उत्पादों की नियमित उपलब्धता तथा कर्मचारियों द्वारा समय-समय पर दी जा रही तकनीकी जानकारी किसानों के लिए काफी उपयोगी साबित हो रही है। किसानों को उत्पाद उपलब्ध होने की सूचना भी समय पर दी जाती है, जिससे उन्हें अनावश्यक परेशानी नहीं होती। नैनो डीएपी का उपयोग धान के बीज उपचार में किया जाता है। बुआई से लगभग आधा घंटा पहले प्रति किलोग्राम धान बीज में 5 मिलीलीटर नैनो डीएपी मिलाकर उपचारित करने के बाद बीज को सुखाकर बुवाई करने से बेहतर अंकुरण और पौधों की शुरुआती वृद्धि में लाभ मिलता है। इसी प्रकार नैनो यूरिया का उपयोग फसल की वृद्धि अवस्था में स्प्रे के माध्यम से किया जाता है। धान की फसल 20 से 22 दिन की होने पर एक एकड़ क्षेत्र में एक बोतल नैनो यूरिया का छिड़काव करने से पारंपरिक यूरिया की आवश्यकता कम हो जाती है। इससे एक एकड़ में यूरिया की खपत को लगभग 25 से 30 किलोग्राम तक सीमित किया जा सकता है, जिससे लागत में उल्लेखनीय कमी आती है।

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