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C.G. News पहले उगाया ढैंचा, फिर करेंगे धान की रोपाई

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लैलूंगा के कृषक चंद्रशेखर पटेल ने 4 एकड़ में तैयार की हरी खाद, कम लागत में बेहतर उत्पादन का लक्ष्य

रायगढ़, 20 जुलाई 2026 खेती की बढ़ती लागत और मिट्टी की घटती उर्वरता के बीच लैलूंगा विकासखंड के प्रगतिशील कृषक चंद्रशेखर पटेल ने प्राकृतिक खेती का ऐसा मॉडल तैयार किया है, जो जिले के किसानों के लिए प्रेरणा बन रहा है। उन्होंने इस खरीफ सीजन में सुगंधित जवांफूल धान की खेती से पहले अपने चार एकड़ खेत में ढैंचा (हरी खाद) की बुवाई की। वर्तमान में खेत में खड़ा ढैंचा लगभग छह फीट ऊंचाई तक पहुंच चुका है और पूरे खेत में हरियाली की चादर बिछी हुई है।
कृषक चंद्रशेखर पटेल ने बताया कि ढैंचा को अभी लगभग 20 दिन और खेत में रहने दिया जाएगा। इसके बाद जवांफूल धान की रोपाई से दो से तीन दिन पहले ट्रैक्टर से जुताई कर पूरे ढैंचा को मिट्टी में मिला दिया जाएगा। मिट्टी में दबने के बाद ढैंचा सड़कर प्राकृतिक हरी खाद में परिवर्तित हो जाएगा, जिससे खेत को भरपूर जैविक पोषण मिलेगा। उन्होंने बताया कि इस वर्ष उनके द्वारा चार एकड़ क्षेत्र में सुगंधित जवांफूल धान की खेती की जा रही है। धान की बुवाई से पहले बीज का नमक घोल विधि से शोधन किया गया है, ताकि हल्के और अनुपयोगी बीज अलग हो जाएं तथा केवल स्वस्थ एवं गुणवत्तापूर्ण बीजों का ही उपयोग किया जा सके।
चंद्रशेखर पटेल का कहना है कि खेती केवल अधिक उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि मिट्टी को स्वस्थ बनाए रखने का भी दायित्व है। यदि किसान फसल चक्र, हरी खाद, बीज शोधन और प्राकृतिक खेती की तकनीकों को अपनाएं तो कम लागत में बेहतर गुणवत्ता वाली फसल प्राप्त की जा सकती है। वहीं कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि ढैंचा की फसल मिट्टी में मिलाने के बाद यह प्राकृतिक उर्वरक का कार्य करती है, जिससे अगली फसल को आवश्यक पोषक तत्व सहज रूप से उपलब्ध हो जाते हैं। ढैंचा जैसी हरी खाद वाली फसलें मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ-साथ लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या में वृद्धि करती हैं। इससे मिट्टी की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणवत्ता में सुधार होता है। लगातार हरी खाद के उपयोग से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है, उत्पादन लागत घटती है तथा पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है। जिले में प्राकृतिक खेती और जैविक कृषि को बढ़ावा देने के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं। ऐसे में लैलूंगा के कृषक चंद्रशेखर पटेल का यह प्रयोग न केवल मिट्टी की सेहत सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि यह भी साबित करता है कि वैज्ञानिक सोच, सही योजना और प्राकृतिक संसाधनों के समुचित उपयोग से खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाया जा सकता है।

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