रायगढ़। औद्योगिक विकास के नक्शे पर तेजी से आगे बढ़ रहे रायगढ़ में अब एक नई बड़ी स्टील एवं पावर परियोजना को लेकर पर्यावरणीय बहस तेज हो गई है। नवापारा (टेंडा) एवं चारमार क्षेत्र में बी.एस. स्पंज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा प्रस्तावित परियोजना की अनुमानित लागत करीब 1,755 करोड़ रुपये बताई गई है। पर्यावरणीय दस्तावेजों के अनुसार परियोजना के लिए लगभग 35.37 हेक्टेयर भूमि चिन्हित की गई है।
परियोजना का आकार और प्रस्तावित उत्पादन क्षमता इसे सामान्य औद्योगिक इकाई से कहीं बड़ा बनाती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल निवेश और उत्पादन का नहीं, बल्कि यह है कि इस परियोजना का आसपास की हवा, पानी, कृषि भूमि और ग्रामीण आबादी पर संचयी प्रभाव कितना होगा?
एक परिसर में कई भारी औद्योगिक इकाइयां
परियोजना के कार्यकारी सारांश में स्पंज आयरन, स्टील बिलेट, टीएमटी बार, वायर रॉड, रोलिंग मिल, फेरो एलॉय, कोल गैसीफायर, कोयला वॉशरी और विद्युत उत्पादन जैसी विभिन्न इकाइयों का प्रस्ताव किया गया है।
दस्तावेज के मुताबिक डीआरआई फर्नेस की प्रस्तावित क्षमता 8.58 लाख टीपीए, इंडक्शन फर्नेस से स्टील उत्पादन 7.92 लाख टीपीए, इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस से करीब 3.30 लाख टीपीए, रोलिंग मिल की क्षमता 7.92 लाख टीपीए तथा कोल वॉशरी की क्षमता 22.50 लाख टीपीए बताई गई है।
यानी एक ही परियोजना परिसर में कई ऐसी औद्योगिक गतिविधियां प्रस्तावित हैं, जिनमें कच्चे माल की खपत, ऊर्जा उपयोग, परिवहन, उत्सर्जन और औद्योगिक अपशिष्ट की मात्रा महत्वपूर्ण हो सकती है।

रायगढ़ में पहले से उद्योगों का दबाव, अब संचयी प्रभाव की बारी
रायगढ़ पहले से ही स्पंज आयरन, स्टील, पावर और कोयला आधारित उद्योगों के लिए जाना जाता है। ऐसे में किसी नई परियोजना का आकलन केवल उसके अपने प्रदूषण स्तर तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा।
जरूरत इस बात की है कि क्षेत्र में पहले से संचालित उद्योगों के वायु उत्सर्जन, जल उपयोग, औद्योगिक अपशिष्ट और भारी वाहनों के दबाव के साथ प्रस्तावित परियोजना के संभावित प्रभाव को जोड़कर देखा जाए।
यही संचयी पर्यावरणीय प्रभाव यह तय करने में महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित क्षेत्र और जिले की पर्यावरणीय वहन क्षमता पर कितना अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
हवा को लेकर सबसे बड़ा सवाल—उत्सर्जन की निगरानी कैसे होगी?
स्पंज आयरन, स्टील निर्माण, कोयला आधारित प्रक्रियाओं, गैसीफिकेशन और भारी औद्योगिक परिवहन जैसी गतिविधियों में धूल एवं विभिन्न गैसीय प्रदूषकों के उत्सर्जन की संभावना रहती है।
कंपनी द्वारा प्रदूषण नियंत्रण के लिए आधुनिक उपकरण लगाए जाने का दावा किया जाए, लेकिन असली सवाल उनके 24 घंटे प्रभावी संचालन और स्वतंत्र निगरानी का होगा।
क्या संयंत्र की चिमनियों के उत्सर्जन की रियल टाइम निगरानी होगी? क्या आसपास के गांवों में वायु गुणवत्ता की नियमित निगरानी होगी? निगरानी के आंकड़े सार्वजनिक किए जाएंगे या नहीं? इन सवालों का स्पष्ट जवाब जनसुनवाई में सामने आना जरूरी होगा।
पानी कहां से आएगा, गांवों पर कितना पड़ेगा असर?
इतनी बड़ी औद्योगिक परियोजना के संचालन में पानी की आवश्यकता भी महत्वपूर्ण होगी। ऐसे में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि संयंत्र के लिए पानी का स्रोत क्या होगा और प्रस्तावित जल उपयोग का स्थानीय जल संसाधनों पर कितना प्रभाव पड़ेगा।
विशेष रूप से यह सवाल अहम है कि भू-जल स्तर, स्थानीय तालाबों, नालों और अन्य जलस्रोतों पर परियोजना का संभावित प्रभाव क्या होगा?
साथ ही औद्योगिक प्रक्रिया से निकलने वाले अपशिष्ट जल का उपचार किस तकनीक से होगा और उपचारित पानी का पुन: उपयोग कितना किया जाएगा, यह भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए।
राख, स्लैग और औद्योगिक कचरे का प्रबंधन कितना सुरक्षित?
बड़ी उत्पादन क्षमता वाली स्टील एवं पावर परियोजना से फ्लाई ऐश, बॉटम ऐश, स्लैग, धूल और अन्य औद्योगिक ठोस अपशिष्ट उत्पन्न होने की संभावना रहती है।
ऐसे में केवल यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि अपशिष्ट का वैज्ञानिक प्रबंधन किया जाएगा। जरूरी यह है कि परियोजना शुरू होने के बाद प्रतिदिन और प्रतिवर्ष कितना अपशिष्ट पैदा होगा, उसका उपयोग कहां होगा, उसका भंडारण कैसे किया जाएगा और निस्तारण की निगरानी कौन करेगा, इसकी स्पष्ट जानकारी सामने आए।
किसी भी स्तर पर लापरवाही होने की स्थिति में औद्योगिक अपशिष्ट का प्रभाव मिट्टी और जलस्रोतों तक पहुंच सकता है।
35.37 हेक्टेयर जमीन के बाद बदलेगा आसपास का भू-दृश्य
परियोजना के लिए चिन्हित 35.37 हेक्टेयर भूमि का उपयोग भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। औद्योगिक गतिविधियों का प्रभाव केवल प्लांट परिसर तक सीमित नहीं रहता। निर्माण, सड़कों, कच्चे माल के भंडारण, जल निकासी और भारी वाहनों की आवाजाही का असर आसपास के क्षेत्र पर भी पड़ सकता है।
यदि परियोजना के आसपास कृषि भूमि और ग्रामीण आबादी है, तो यह देखना जरूरी होगा कि धूल, उत्सर्जन और यातायात का खेती तथा ग्रामीण जीवन पर संभावित प्रभाव कितना होगा।
सड़कों पर बढ़ेंगे भारी वाहन, सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा
स्टील उद्योग के लिए लौह अयस्क, कोयला, चूना पत्थर और अन्य कच्चे माल की लगातार आपूर्ति जरूरी होगी। तैयार उत्पाद की ढुलाई के लिए भी बड़ी संख्या में वाहनों की आवश्यकता होगी।
इससे स्थानीय सड़कों पर यातायात दबाव, धूल और शोर बढ़ने के साथ दुर्घटनाओं का जोखिम भी बढ़ सकता है।
इसलिए परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय आकलन में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि प्रतिदिन कितने भारी वाहनों की आवाजाही प्रस्तावित है और उनके लिए अलग परिवहन मार्ग अथवा सुरक्षित यातायात व्यवस्था क्या होगी।
जनसुनवाई में जनता के सवालों का जवाब जरूरी
पर्यावरणीय जनसुनवाई को महज औपचारिक प्रक्रिया के बजाय स्थानीय जनता की चिंताओं को सामने लाने का वास्तविक मंच बनाया जाना जरूरी है।
ग्रामीणों और प्रभावित क्षेत्र के लोगों को यह जानकारी स्पष्ट रूप से मिलनी चाहिए कि परियोजना से कितना पानी लिया जाएगा, कितना अपशिष्ट पैदा होगा, प्रदूषण नियंत्रण की व्यवस्था क्या होगी, भारी वाहनों की संख्या कितनी बढ़ेगी और किसी आपात स्थिति में आसपास के गांवों की सुरक्षा के लिए क्या योजना है।
इसके साथ ही परियोजना शुरू होने से पहले और बाद की पर्यावरणीय स्थिति की तुलना के लिए पारदर्शी और स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होगी।
सवाल उद्योग विरोध का नहीं, टिकाऊ विकास का
रायगढ़ में उद्योग आएं, निवेश बढ़े, रोजगार पैदा हों और स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो—इसका विरोध नहीं होना चाहिए। लेकिन औद्योगिक विकास की कीमत यदि हवा, पानी, खेती और लोगों के जीवन की गुणवत्ता में गिरावट के रूप में चुकानी पड़े, तो उस विकास मॉडल पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
बी.एस. स्पंज की प्रस्तावित परियोजना के मामले में भी यही अपेक्षा है कि पर्यावरणीय सुरक्षा से जुड़े सभी पहलुओं को सार्वजनिक किया जाए और स्थानीय लोगों की आशंकाओं का तथ्यात्मक जवाब दिया जाए।
1,755 करोड़ का निवेश बड़ा है, लेकिन पर्यावरण की कीमत उससे बड़ी नहीं होनी चाहिए
रायगढ़ में नई परियोजना रोजगार और आर्थिक गतिविधियां ला सकती है, लेकिन इसके साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होगी।अब असली सवाल यह है कि 1,755 करोड़ रुपये के इस निवेश से रायगढ़ को कितना आर्थिक लाभ मिलेगा, और इसके साथ पर्यावरण पर कितना अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।जनसुनवाई में केवल परियोजना की उत्पादन क्षमता और निवेश की चर्चा नहीं, बल्कि हवा, पानी, जमीन, कृषि, यातायात और स्थानीय लोगों के भविष्य पर पड़ने वाले प्रभाव की भी गंभीर पड़ताल जरूरी है।विकास की रफ्तार तेज हो सकती है, लेकिन रायगढ़ की हवा और पानी को उसकी कीमत पर नहीं बनाया जा सकता।



