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Jagannath Rath Yatra 2024: पुरी में शुरू हुई जगन्नाथ रथ यात्रा, 53 साल बाद निकलेगी दो दिवसीय जगन्नाथ रथ यात्रा

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Jagannath Rath Yatra 2024: Jagannath Rath Yatra started in Puri, two-day Jagannath Rath Yatra will be held after 53 years

ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का उत्सव शुरू हो चुका है। 53 साल बाद यह यात्रा दो दिनों की हो रही है। मान्यता के अनुसार स्नान पूर्णिमा पर स्नान के बाद भगवान बीमार हो जाते हैं। इस साल भी स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान ठीक हो चुके हैं। रथयात्रा शुरू होने से पहले होने वाली रस्में रविवार को ही हो रही हैं। जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा दोपहर 2.30 बजे अपने-अपने रथ में विराजमान हुए। जगन्नाथ मंदिर के पंचांगकर्ता डॉ. ज्योति प्रसाद ने बताया कि भगवान को आम दिनों से 2 घंटे पहले जगाया गया और मंगला आरती सुबह 4 की बजाय तड़के 2 बजे हुई। मंगला आरती के बाद करीब 2.30 बजे दशावतार पूजन हुआ। 3 बजे नैत्रोत्सव और 4 बजे पुरी के राजा की तरफ से पूजा की गई। सुबह 5.10 बजे सूर्य पूजा और करीब 5.30 बजे द्वारपाल पूजा हुई। सुबह 7 बजे भगवान को खिचड़ी भोग-प्रसाद लगाया गया।

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रथयात्रा शुरू हो गई है। सबसे पहले बलभद्र का रथ खींचा गया, अब कुछ ही देर में सुभद्रा और जगन्नाथ जी का रथ आगे बढ़ेगा। गजपति महाराजा ने देवी सुभद्रा के रथ पर पूजा की। इससे पहले राजा बलभद्र और जगन्नाथ जी के रथ पर पूजा कर चुके हैं। गजपति महाराजा ने सबसे पहले बलभद्र के रथ को सोने की झाड़ू से बुहारा। इसके बाद बलभद्र के रथ में घोड़े लगाए जा रहे हैं। भगवान की पूजा के बाद रथ प्रतिष्ठा के बाद पुरी के राजा दिव्य सिंह देव ने छोरा पोहरा की परंपरा पूरी की। इसमें राजा ने सोने की झाड़ू से रथ को बुहारा। इस झाड़ू का हत्था सोने का होता है। पुरी के गजपति महाराजा ने भगवान की पूजा की। गजपति महाराजा को जगन्नाथ जी का प्रमुख सेवक माना जाता है।

जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार पर खड़े रहेंगे रथ

रथ यात्रा में शामिल होने वाले रथों को जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार के सामने खड़ा किया गया है, जहां से उन्हें गुंडिचा मंदिर ले जाया जाएगा. वहां रथ एक सप्ताह तक रहेंगे. रविवार दोपहर को भक्त रथों को खींचेंगे. इस साल रथ यात्रा और संबंधित अनुष्ठान जैसे ‘नवयौवन दर्शन’ और ‘नेत्र उत्सव’ एक ही दिन रविवार यानी 7 जुलाई 2024 को आयोजित किए जाएंगे. ये अनुष्ठान आम तौर पर रथ यात्रा से पहले आयोजित किए जाते हैं.

पौराणिक कथाओं के अनुसार, स्नान पूर्णिमा पर अधिक स्नान करने के कारण देवता अस्वस्थ हो जाते हैं और इसलिए अंदर ही रहते हैं. ‘नवयौवन दर्शन’ से पहले, पुजारी ‘नेत्र उत्सव’ नामक विशेष अनुष्ठान करते हैं, जिसमें देवताओं की आंखों की पुतलियों को नए सिरे से रंगा जाता है.

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