To stay healthy, it is necessary to have a balance of the three doshas viz. vata, pitta and kapha
आयुर्वेद चिकित्सालय में बासन्तिक वमन का हुआ आयोजन, 32 लोग हुए लाभान्वित

रायगढ़, जिला आयुष अधिकारी डॉ.सी.एस.गौराहा के मार्गदर्शन में शासकीय आयुर्वेद जिला चिकित्सालय, रायगढ़ में पदस्थ डॉ.रविशंकर पटेल (एमडी) कार्यचिकित्सा के द्वारा बासन्तिक वमन का आयोजन किया गया। 15 फरवरी से 15 अप्रैल तक चले बासन्तिक वमन में कुल 32 लोगों को लाभ दिया गया।
आयुर्वेद सिद्धांत के अनुसार शरीर के स्वस्थ रहने के लिए वात, पित्त और कफ इन त्रिदोषों का संतुलन होना जरुरी है जहाँ इनमें से किसी भी एक दोष का संतुलन बिगड़ता तो शरीर में विषाक्त तत्व आम (टॉक्सिन) का निर्माण होता है जो शरीर में विभिन्न रोगों की उत्पत्ति का एक प्रमुख कारण बनता है। पंचकर्म चिकित्सा से शरीर का शोधन कर त्रिदोषों को संतुलित किया जाता है और विषाक्त तत्व को शरीर से बाहर कर दिया जाता है। डॉ रविशंकर पटेल ने वमन कर्म के बारे में बताया कि कफ दोष से होने वाली बीमारियों की एक विशेष शोधन चिकित्सा है। कफ दोष का प्रमुख स्थान अमाशय को माना गया है और वमन कर्म से कफ दोष एवं अमाशय दोनों की शुद्धि होती है। वमन कर्म में मदनफल, मुलेठी आदि औषधि द्रव्यों का प्रयोग कर मुख मार्ग से उल्टी के माध्यम से दूषित कफ और पित्त दोष को शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है। वमन कर्म 2 प्रकार से किया जा सकता है-स्वस्थ व्यक्ति में स्वास्थ्य संरक्षणार्थ हर वर्ष बसंत ऋतु में एवं 2 वमन साध्य रोगों में जैसे सर्दी, खांसी, श्वास रोग, अस्थमा, अजीर्ण, अम्लपित्त, थाइरोइड, बीपी, कॉलेस्ट्रॉल, चर्म रोग, एलर्जी, ग्रंथि, फाइलेरिया इत्यादि में व्याधि हरणार्थ किसी भी ऋतु में। आयुर्वेद में दोशात्मक चिकित्सा को महत्व दिया जाता है रोग का नामकरण कुछ भी हो केवल शारीरिक लक्षणों के आधार पर व्याधि के मूल कारण, दोषों का निर्धारण किया जाता है और दोषानुसार शमन (औषध) या शोधन (पंचकर्म) चिकित्सा का प्रयोग करने से व्याधि पूरी तरह ठीक हो जाती है। जनसामान्य में ऐसी धारणा बनी हुई है कि थाइरोइड, बीपी, मधुमेह जैसी बीमारियां कभी भी पूरी तरह से ठीक नहीं होती इसके लिए आजीवन दवाईयां लेनी पड़ती है लेकिन ऐसा नहीं है ये सभी बीमारियां जीवनशैली से जुड़ी हुई है, खराब जीवनशैली के कारण उत्पन्न शारीरिक लक्षणो के आधार पर व्याधि के मूल निदान (विकृत दोषों) का सही परिज्ञान कर अवस्था नुसार की गई शमन या शोधन चिकित्सा से इन व्याधियों को उसी प्रकार नष्ट किया जा सकता है जैसे किसी वृक्ष के आश्रय मूल (जड़) को काट देने से सम्पूर्ण वृक्ष नष्ट हो जाता है।
डॉ रविशंकर पटेल ने कहा जिस प्रकार भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए जीवन बीमा आदि उपायों का हर वर्ष नवीनीकरण किया जाता ठीक उसी प्रकार शरीर को कफज व्याधि से मुक्त रखने के लिए हर वर्ष बसंत ऋतु में स्वस्थ व्यक्ति को एक बार वमन कर्म जरूर कराना चाहिए। बासन्तिक वमन में हॉस्पिटल स्टॉफ, शिव परीक्षा, मालती बाई, किशोर बाग का विशेष सहयोग रहा।



