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रायगढ़ में फिर औद्योगिक विस्तार की दस्तक, पर्यावरण पर बढ़ी चिंता! अदानी पावर के जनसुनवाई से पहले ..

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अदानी पावर के 1600 मेगावाट विस्तार प्रस्ताव ने छेड़ी नई बहस, फ्लाई ऐश, पानी और प्रदूषण प्रबंधन को लेकर जनसुनवाई से पहले उठे कई अहम सवाल
रायगढ़। उद्योगों की राजधानी कहे जाने वाले रायगढ़ में एक बार फिर बड़े औद्योगिक निवेश की तैयारी शुरू हो गई है। अदानी पावर लिमिटेड ने अपने संचालित ताप विद्युत संयंत्र के विस्तार के लिए 1600 मेगावाट क्षमता की दो नई अल्ट्रा सुपर क्रिटिकल इकाइयों का प्रस्ताव प्रस्तुत किया है। प्रस्ताव को स्वीकृति मिलने पर संयंत्र की कुल उत्पादन क्षमता 2200 मेगावाट से बढ़कर 3800 मेगावाट हो जाएगी। कंपनी का कहना है कि आधुनिक तकनीकों के माध्यम से पर्यावरणीय मानकों का पालन करते हुए यह विस्तार किया जाएगा, लेकिन प्रस्ताव सार्वजनिक होने के साथ ही पर्यावरण संरक्षण और संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।
विस्तार के साथ बढ़ेगी संसाधनों की मांग
परियोजना के दस्तावेज बताते हैं कि नई इकाइयों के लिए लगभग 185 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता होगी। इसके अलावा हर वर्ष 6.67 मिलियन टन अतिरिक्त कोयले की जरूरत पड़ेगी, जिससे कुल कोयला खपत 16.52 मिलियन टन प्रतिवर्ष तक पहुंच जाएगी। जल उपयोग में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी और संयंत्र के लिए कुल 82 एमसीएम पानी की आवश्यकता होगी, जिसमें 32 एमसीएम अतिरिक्त पानी महानदी से लिया जाना प्रस्तावित है। यही नहीं, विस्तार के बाद प्रतिवर्ष लगभग 2.66 मिलियन टन अतिरिक्त फ्लाई ऐश उत्पन्न होने का अनुमान है। कंपनी का दावा है कि इसका शत-प्रतिशत उपयोग किया जाएगा और पर्यावरणीय नियमों के अनुरूप सुरक्षित प्रबंधन सुनिश्चित रहेगा।
जमीनी हालात पर उठ रहे सवाल
कागजों में किए गए दावों के बीच स्थानीय स्तर पर अलग तस्वीर देखने को मिलती है। जिले के कई क्षेत्रों में सड़क किनारे, नालों, खेतों और जंगलों के आसपास फ्लाई ऐश के ढेर समय-समय पर दिखाई देते रहे हैं। बरसात के दौरान यही राख बहकर कृषि भूमि और जल स्रोतों तक पहुंचने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि उड़ती राख से सांस संबंधी परेशानियां बढ़ रही हैं, जबकि किसानों का दावा है कि खेतों की उत्पादकता पर भी इसका असर पड़ रहा है। ऐसे में लोगों का कहना है कि नए विस्तार से पहले वर्तमान स्थिति का निष्पक्ष मूल्यांकन जरूरी है।
विकास के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी जरूरी
रायगढ़ पहले से ही कोयला खनन, ताप विद्युत संयंत्रों और इस्पात उद्योगों का प्रमुख केंद्र है। लगातार बढ़ते औद्योगिक दबाव के कारण वायु गुणवत्ता, जल संसाधनों और परिवहन व्यवस्था पर अतिरिक्त भार पड़ने की आशंका भी व्यक्त की जा रही है।
पर्यावरण से जुड़े जानकारों का मानना है कि किसी भी नई परियोजना की स्वीकृति से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि वर्तमान संयंत्र पर्यावरणीय स्वीकृतियों की सभी शर्तों का प्रभावी ढंग से पालन कर रहा है या नहीं। यदि फ्लाई ऐश के शत-प्रतिशत उपयोग का दावा किया जा रहा है, तो खुले क्षेत्रों में दिखाई देने वाली राख की वास्तविक स्थिति और उसके स्रोत की भी पारदर्शी जांच होनी चाहिए।
जनसुनवाई में जवाब चाहेंगे क्षेत्रवासी
प्रस्तावित परियोजना की जनसुनवाई अब केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं रह गई है। क्षेत्र के लोग उद्योग, प्रशासन और पर्यावरणीय नियामक संस्थाओं से कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर स्पष्ट जवाब चाहते हैं।
लोगों का कहना है कि यदि वर्तमान संयंत्र में पर्यावरणीय प्रबंधन पूरी तरह प्रभावी है, तो खुले क्षेत्रों में फ्लाई ऐश क्यों दिखाई देती है? प्रदूषण संबंधी शिकायतों पर अब तक कितनी कार्रवाई हुई? अतिरिक्त 2.66 मिलियन टन फ्लाई ऐश का सुरक्षित निपटान किस व्यवस्था से होगा? महानदी से अतिरिक्त पानी लेने का स्थानीय जल संसाधनों और किसानों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? और क्या नए विस्तार की अनुमति से पहले वर्तमान संयंत्र का स्वतंत्र सामाजिक एवं पर्यावरणीय ऑडिट सार्वजनिक किया जाएगा?
जनता की नजरें जनसुनवाई पर
रायगढ़ में प्रस्तावित यह विस्तार केवल औद्योगिक निवेश का विषय नहीं रह गया है, बल्कि पर्यावरणीय जवाबदेही की कसौटी भी बनता जा रहा है। विकास और रोजगार की संभावनाओं के साथ-साथ लोगों की अपेक्षा है कि पर्यावरण संरक्षण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा को भी समान महत्व दिया जाए।
अब सभी की निगाहें आगामी जनसुनवाई पर टिकी हैं, जहां उम्मीद की जा रही है कि परियोजना से जुड़े हर पहलू पर खुलकर चर्चा होगी और क्षेत्रवासियों की शंकाओं का तथ्यात्मक एवं पारदर्शी जवाब सामने आएगा।
Ro.No - 13848/144

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