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20 करोड़ के वाटर मीटर, 8 हजार मीटर चोरी! जनता का पैसा खर्च, फिर भी पानी का संकट बरकरार?

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रायगढ़। रायगढ़ में पानी के नाम पर जनता के पैसों से करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन शहरवासियों को इसका पूरा लाभ आज तक नहीं मिल पाया। अमृत मिशन में करीब 144 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद कई इलाकों में नियमित पानी की समस्या बनी हुई है। ऊपर से पानी की खपत का हिसाब रखने के लिए करीब 20 करोड़ रुपये खर्च कर लगाए गए 28 हजार 47 वाटर मीटरों में से 8 हजार चोरी हो गए। यानी जनता से टैक्स और जलकर लिया जा रहा है, करोड़ों रुपये की योजना पर खर्च हो रहे हैं, लेकिन न तो व्यवस्था पूरी तरह लागू हुई और न ही लोग इससे संतुष्ट हैं।

अमृत मिशन के तहत रायगढ़ में वर्ष 2015 से पानी की व्यवस्था सुधारने का काम शुरू हुआ। वर्ष 2022 में योजना पूरी होने का दावा किया गया। शहर के 48 वार्डों में करीब 350 किलोमीटर पाइपलाइन बिछाई गई और करीब 144 करोड़ रुपये खर्च हुए। लेकिन आज भी कई वार्डों में नियमित जलापूर्ति की शिकायतें हैं। यानी करोड़ों खर्च होने के बाद भी योजना का पूरा फायदा शहरवासियों को नहीं मिल पाया।

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यही नहीं, पानी की खपत का सही हिसाब रखने के लिए करीब 28 हजार 47 घरों में वाटर मीटर लगाए गए। इस पर करीब 20 करोड़ रुपये खर्च हुए। उपभोक्ताओं से करीब 2200 रुपये प्रति मीटर भी जमा कराए गए। लेकिन रीडिंग और खपत के आधार पर बिलिंग व्यवस्था पूरी तरह शुरू हो पाती, उससे पहले ही करीब 8 हजार मीटर चोरी हो गए। सवाल है—जनता के पैसे से बनी इस व्यवस्था की निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी?

रायगढ़ में सवाल सिर्फ 8 हजार चोरी हुए वाटर मीटरों का नहीं है। सवाल उस करोड़ों रुपये की योजना का है, जिसका पैसा जनता के टैक्स और दूसरे राजस्व से आया। करीब 144 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी अगर लोगों को नियमित पानी नहीं मिल रहा और 20 करोड़ की मीटर व्यवस्था भी प्रभावी नहीं हो सकी, तो जवाबदेही तय होना जरूरी है। जनता अब पूछ रही है—पैसा खर्च हुआ तो उसका फायदा कहां मिला?

एक तरफ शहरवासी जलकर और टैक्स चुका रहे हैं, दूसरी तरफ करोड़ों की योजना के बावजूद पानी की समस्या झेल रहे हैं। 400 के करीब बोर पंप और 350 किलोमीटर पाइपलाइन के बावजूद कई इलाकों में संकट बरकरार है।

अब वाटर मीटर दोबारा लगाने और व्यवस्था शुरू करने की बात कही जा रही है। लेकिन सवाल कायम है-जनता के पैसे का हिसाब कौन देगा? योजना की निगरानी में चूक के लिए जिम्मेदार कौन है? और शहरवासियों को अपने पैसे के बदले पूरी सुविधा आखिर कब मिलेगी?

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