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क्या रायगढ़ के भविष्य पर लगने जा रही है प्रदूषण की नई मुहर? शहर से सटे इलाके में 814 करोड़ की औद्योगिक परियोजना पर उठे गंभीर सवाल

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गढ़उमरिया-दर्रामुड़ा में प्रस्तावित स्टील, फेरो अलॉय और 50 मेगावाट पावर प्लांट की जनसुनवाई चर्चा के केंद्र में, नागरिक पूछ रहे विकास के साथ पर्यावरण की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?

रायगढ़। औद्योगिक विकास के नाम पर एक बार फिर रायगढ़ एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है। शहर से कुछ ही दूरी पर स्थित गढ़उमरिया और दर्रामुड़ा क्षेत्र में प्रस्तावित विशाल औद्योगिक परियोजना को लेकर लोगों के बीच चर्चा, चिंता और सवालों का दौर शुरू हो चुका है। मेसर्स रुंगटा संस प्राइवेट लिमिटेड द्वारा लगभग 814.5 करोड़ रुपये की लागत से एकीकृत इस्पात संयंत्र, फेरो अलॉय यूनिट तथा 50 मेगावाट क्षमता के कैप्टिव पावर प्लांट की स्थापना का प्रस्ताव रखा गया है।
परियोजना को लेकर सबसे बड़ी चिंता इसकी लोकेशन को लेकर है। आमतौर पर भारी उद्योग दूरस्थ औद्योगिक क्षेत्रों में स्थापित किए जाते हैं, लेकिन यह परियोजना रायगढ़ शहर की आबादी के बेहद नजदीक प्रस्तावित है। यही वजह है कि आगामी जनसुनवाई को लेकर लोगों की दिलचस्पी और चिंता दोनों बढ़ती जा रही हैं।

शहर के करीब भारी उद्योग, क्या बढ़ेगा पर्यावरणीय दबाव?

रायगढ़ जिला पहले से ही औद्योगिक गतिविधियों के कारण राष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखता है। तमनार, पूंजीपथरा, घरघोड़ा और धर्मजयगढ़ क्षेत्रों में वर्षों से संचालित उद्योगों को लेकर प्रदूषण संबंधी शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। ऐसे में नागरिकों का सवाल है कि जब दूरस्थ औद्योगिक क्षेत्रों का प्रभाव शहर तक महसूस किया जा रहा है, तब शहर की सीमा से लगे क्षेत्र में प्रस्तावित इस नई परियोजना का असर कितना व्यापक हो सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार स्टील और फेरो अलॉय उद्योगों में कोयला, लौह अयस्क और अन्य खनिज पदार्थों के उपयोग के कारण धूलकण, गैसीय उत्सर्जन, राख तथा धात्विक कणों की मात्रा बढ़ने की आशंका रहती है। यदि प्रदूषण नियंत्रण के उपाय पूरी क्षमता से लागू नहीं किए गए तो इसके प्रभाव वायु गुणवत्ता, जल स्रोतों और जनस्वास्थ्य पर पड़ सकते हैं।

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क्या-क्या बनेगा परियोजना में?

पर्यावरणीय दस्तावेजों के अनुसार प्रस्तावित परियोजना में निम्नलिखित औद्योगिक इकाइयां स्थापित की जानी हैं।
● 2.145 लाख टन प्रतिवर्ष क्षमता का डीआरआई (स्पंज आयरन) प्लांट
● 2.24 लाख टन प्रतिवर्ष क्षमता की स्टील मेल्टिंग शॉप
● 2 लाख टन प्रतिवर्ष क्षमता की रोलिंग मिल
● 42,900 टन प्रतिवर्ष क्षमता की फेरो अलॉय यूनिट
● 200 टन प्रतिदिन क्षमता का सिंटर प्लांट
● 10 टन प्रति घंटा मेटल रिकवरी यूनिट
● 15 टन प्रति घंटा रीहीटिंग फर्नेस
● 50 मेगावाट क्षमता का कैप्टिव पावर प्लांट

जनसुनवाई या शहर के भविष्य का फैसला?

स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यह जनसुनवाई महज एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है। यह रायगढ़ के पर्यावरणीय भविष्य, स्वास्थ्य सुरक्षा और आने वाली पीढ़ियों के जीवन स्तर से जुड़ा विषय है।
कई लोगों का कहना है कि विकास आवश्यक है, उद्योग जरूरी हैं और रोजगार के अवसर भी बढ़ने चाहिए, लेकिन इसके साथ यह सुनिश्चित होना चाहिए कि पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य की कीमत पर विकास न हो। शहर के आसपास बढ़ती आबादी और पहले से मौजूद प्रदूषण के बीच इस परियोजना के संभावित प्रभावों का गंभीर मूल्यांकन जरूरी है।

जनसुनवाई में जवाब मांग रहे लोग

परियोजना को लेकर शहरवासियों के मन में कई ऐसे सवाल हैं जिनका स्पष्ट और सार्वजनिक उत्तर अपेक्षित है। उनका कहना है कि प्रतिदिन परियोजना में कितने पानी की आवश्यकता होगी और उसका स्रोत क्या होगा? वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए कौन-कौन से अत्याधुनिक उपकरण लगाए जाएंगे? फ्लाई ऐश, स्लैग और अन्य औद्योगिक अपशिष्टों का निपटान किस प्रकार किया जाएगा? स्थानीय युवाओं को रोजगार में कितनी प्राथमिकता मिलेगी? पर्यावरणीय मानकों के उल्लंघन की स्थिति में जवाबदेही किसकी होगी? क्या शहर के इतने निकट भारी औद्योगिक परियोजना स्थापित करना दीर्घकालिक रूप से उचित और सुरक्षित माना जा सकता है?

सिर्फ उद्योग नहीं, रायगढ़ की सांसों का सवाल

आगामी जनसुनवाई अब केवल एक कंपनी की परियोजना तक सीमित नहीं रह गई है। यह चर्चा रायगढ़ के पर्यावरण, नागरिकों के स्वास्थ्य और शहर के भविष्य को लेकर हो रही है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि जनसुनवाई में उठने वाले सवालों के जवाब कितने संतोषजनक हैं और विकास तथा पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए क्या ठोस कदम प्रस्तावित किए जाते हैं।
फिलहाल इतना तय है कि यह मुद्दा केवल गढ़उमरिया और दर्रामुड़ा तक सीमित नहीं है, बल्कि रायगढ़ के हर उस परिवार से जुड़ा है जो स्वच्छ हवा, सुरक्षित जल और बेहतर भविष्य की उम्मीद रखता है।

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