EIA report fuels villagers’ anger: Public opposition to the Maa Mangala steel project is emerging
36 से अधिक वनक्षेत्र, 20 शिक्षण संस्थान, धार्मिक स्थल और स्वास्थ्य केंद्र खतरे में; ग्रामीण बोले “परियोजना जनजीवन और पर्यावरण पर भारी”

रायगढ़।
मां मंगला इस्पात प्राइवेट लिमिटेड की प्रस्तावित परियोजना को लेकर ग्रामीणों का आक्रोश लगातार गहराता जा रहा है। पूर्व में प्रकाशित रिपोर्टों में जहां प्रदूषण, जलसंकट और भूमि दोहन को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए थे, वहीं अब पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट की विस्तृत प्रतिलिपि सामने आने के बाद विरोध और अधिक तीव्र हो गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि परियोजना सामाजिक, पर्यावरणीय और जनजीवन के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।
36 से अधिक संरक्षित वन क्षेत्रों पर खतरे की घंटी
ईआईए रिपोर्ट में परियोजना स्थल से 7 से 10 किलोमीटर की परिधि में गढ़डोंगरी आरक्षित वन, केराडूंगरी संरक्षित वन, खारूदलदली संरक्षित वन, बरखाचर संरक्षित वन, जूनवानी और छिरवानी सहित कुल 36 से अधिक संरक्षित व आरक्षित वन दर्ज किए गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इतने विशाल वनक्षेत्रों का निकट होना स्वयं में यह साबित करता है कि परियोजना शुरू होने पर जैव विविधता और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन पर गंभीर असर पड़ेगा।
उनके अनुसार, औद्योगिक कचरा, धूलकण और बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप से वन संरचना को दीर्घकालिक क्षति पहुंच सकती है।
ग्रामीणों का कहना है कि फैक्ट्री संचालन से बढ़ने वाला वायु व ध्वनि प्रदूषण बच्चों के स्वास्थ्य, पढ़ाई और मानसिक विकास पर सीधा असर डालेगा। उन्होंने इसे “बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़” बताया है।
ईआईए रिपोर्ट में कई मंदिरों और धार्मिक स्थलों का उल्लेख किया गया है जो परियोजना स्थल से 4.86 से 9.75 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। ग्रामीणों का कहना है कि प्रदूषण बढ़ने से इन क्षेत्रों की पवित्रता, शांति और सांस्कृतिक माहौल प्रभावित होगा। उन्होंने चेताया कि यह परियोजना न सिर्फ प्राकृतिक पर्यावरण बल्कि स्थानीय संस्कृति और परंपराओं पर भी गहरा वार करेगी।
ग्रामीणों की चेतावनी “निष्पक्ष सुनवाई नहीं तो उग्र आंदोलन”
मिली जानकारी अनुसार ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि जनसुनवाई निष्पक्ष नहीं हुई या ईआईए रिपोर्ट में दर्ज खामियों पर उचित कार्रवाई नहीं की गई तो वे बड़े आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। उनका कहना है कि रिपोर्ट में दर्ज तथ्य स्वयं बताते हैं कि यह परियोजना पुनर्विचार योग्य है, और इसे बिना गहन मूल्यांकन के आगे बढ़ाना पर्यावरण, समाज और जनजीवन के लिए विनाशकारी सिद्ध होगा।



