आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, जहां आधुनिकता की चकाचौंध अक्सर हमें हमारी जड़ों से दूर कर देती है, वहीं भारत के हृदय में बसे छत्तीसगढ़ के गांवों में एक अनमोल विरासत आज भी सांस ले रही है। यह विरासत यहां के घरों की मिट्टी की दीवारों पर जीवंत होती है। ये सिर्फ रंग और रेखाओं का खेल नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही परंपराओं, गहरी आस्थाओं और स्थानीय समुदायों की आत्मा का संवाद है। यह कलाकृतियाँ छत्तीसगढ़ के लोगों की जीवनशैली का एक अभिन्न अंग हैं, जो उनके त्योहारों, अनुष्ठानों और दैनिक जीवन की कहानियों को बयां करती हैं। आइए, इस अद्भुत कला की दुनिया में गहराई से उतरें और जानें कि ये दीवारें क्या कहती हैं।

रजवार भित्ति चित्र: सरगुजा की मिट्टी की पहचान

सरगुजा क्षेत्र के रजवार समुदाय की महिलाएं अपने मिट्टी के घरों को इस अनूठी कला से सजाती हैं । यह सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि उनकी रचनात्मकता और सांस्कृतिक पहचान की अभिव्यक्ति है। इन चित्रों में पेड़-पौधे, पक्षी, और मानव आकृतियों को बेहद खूबसूरती से उकेरा जाता है। स्वर्गीय सोना बाई जैसी कलाकारों ने इस कला को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई, और आज भी उनकी विरासत को नई पीढ़ी आगे बढ़ा रही है ।
सवनाही चित्रकला: बुरी शक्तियों से रक्षा का कवच

श्रावण मास की हरेली अमावस्या के दिन, छत्तीसगढ़ के ग्रामीण घरों के मुख्य द्वार पर गोबर से ‘सवनाही’ बनाई जाती है । स्थानीय मान्यता के अनुसार, यह चित्रकारी घर को बुरी नजर और मौसमी बीमारियों से बचाती है । इसमें चार उंगलियों से सरल लेकिन प्रभावशाली आकृतियां बनाई जाती हैं, जो प्रकृति और मानव के बीच के गहरे संबंध को दर्शाती हैं।
नोहडोरा: नए जीवन के शुभारंभ का प्रतीक

जब कोई नया घर बनता है, तो उसकी गीली मिट्टी की दीवारों पर ‘नोहडोरा’ कला उकेरी जाती है । विशेष रूप से गोंड जनजाति में प्रचलित यह कला नए जीवन, खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक है । इसमें फूल-पत्तियों, पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों की मंगलकारी आकृतियां बनाई जाती हैं ।
पिथौरा चित्रकला: एक जीवंत अनुष्ठान

यह केवल एक चित्रकला नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है, जो मुख्य रूप से राठवा और भील जनजातियों द्वारा अपने प्रमुख देवता ‘बाबा पिथौरा’ को सम्मान देने के लिए किया जाता है । यह चित्रकारी घर में शांति, समृद्धि और खुशहाली लाने की प्रार्थना के साथ की जाती है। इसमें घोड़ों, देवी-देवताओं और ग्रामीण जीवन के दृश्यों का जीवंत चित्रण होता है ।
गोंड चित्रकला: दीवारों पर लोककथाएं

गोंड जनजाति की यह चित्रकला अपनी विशिष्ट शैली के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें बिंदुओं और रेखाओं का बारीक काम होता है । यह कला लोककथाओं, पौराणिक कहानियों और प्रकृति के तत्वों को दीवारों पर जीवंत कर देती है । इसके लिए कलाकार चारकोल, मिट्टी और पौधों जैसे प्राकृतिक स्रोतों से रंग तैयार करते हैं, जो इसे और भी खास बना देता है ।
मुरिया चित्रकारी: बस्तर की आत्मा का प्रतिबिंब

बस्तर की मुरिया जनजाति अपने सामाजिक आवास ‘घोटुल’ और घरों की दीवारों को इस कला से सजाती है । इन चित्रों में उनके त्योहार, नृत्य, शिकार और दैनिक जीवन की झलक मिलती है। आमतौर पर इसे गेरू या सफेद रंग की पृष्ठभूमि पर काले रंग से बनाया जाता है, जो इसे एक अलग पहचान देता है ।
यह चित्रकलाएं छत्तीसगढ़ की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर हैं। ये हमें बताती हैं कि कला सिर्फ संग्रहालयों या दीर्घाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वह लोगों के जीवन में, उनकी आस्था में और उनकी दीवारों पर सांस लेती है। इस विरासत को संरक्षित करना और इन कलाकारों को प्रोत्साहित करना हम सभी की जिम्मेदारी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी जड़ों से जुड़ी इस अनमोल कला को समझ सकें और इस पर गर्व कर सकें।
डिस्क्लेमर– यह सामग्री छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक‑चित्रकलाओं और समुदायों की सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी, स्थानीय परंपराओं और विशेषज्ञ संदर्भों पर आधारित एक सांस्कृतिक फीचर है। भौगोलिक, भाषाई और सामुदायिक विविधताओं के कारण नाम, रीतियों और शैलियों में क्षेत्रवार भिन्नताएँ संभव हैं। किसी भी समुदाय, आस्था या कलाकार की भावनाओं को आहत करना उद्देश्य नहीं है। लेख में वर्णित परंपराएँ और प्रथाएँ सांस्कृतिक दस्तावेज़ीकरण के उद्देश्य से प्रस्तुत हैं, इन्हें किसी धार्मिक/अनुष्ठानिक अनुशंसा के रूप में न लिया जाए। तथ्य‑पुष्टि का यथासंभव प्रयास किया गया है, पर मानवीय त्रुटियाँ संभव हैं; किसी विवरण में असंगति पाए जाने पर सुधार हेतु सूचना आमंत्रित है। लेख में उल्लिखित कलाकारों, संस्थाओं या बाहरी संसाधनों का उल्लेख समर्थन/अनुमोदन का संकेत नहीं है।



