रायगढ़ । छत्तीसगढ़ का सीमांत पूर्वी क्षेत्र रायगढ़ पिछले दो दशकों से उद्योगों के विकास के लिए देश भर में नए प्रतिमान स्थापित कर रहा है । ऊर्जा और इस्पात के हब के रूप में जाने जाना वाला रायगढ़ निश्चित रूप से छत्तीसगढ़ के लिए एक मानक के तौर पर सामने आया है। परन्तु इस विकास की कीमत रायगढ़ और इसकी जनता कैसे और किस हद तक चुका रही है इसका एहसास रायगढ़ आकर ही होता है। कभी अपने जंगल , हरियाली और स्वच्छ पर्यावरण के लिए गर्व करने वाला रायगढ़ आज इन्हें लेकर शर्मिंदगी का सामना कर रहा है। आज रायगढ़ जल, जंगल, जमीन और हवा के प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित है, साथ ही यहां के रहवासी भी इस प्रदूषण की कीमत अपने अनमोल स्वास्थ्य से चुका रहे हैं। पिछले दो दशकों में रायगढ़ ने अपनी हरियाली खो दी, अपने जंगलों को उजड़ता देखा, अपने जल के प्रदूषण को झेल रहे हैं और गंदी हवा को अपने फेफड़ों में भर कर अस्पताल और डॉक्टरों की जेब भर रहे हैं । रायगढ़ और इर्द गिर्द के रहवासियों के लिए मानों इतना पर्याप्त नहीं था , अब कोढ़ में खुजली की तरह 2024 में स्थापित वेदांता ग्रुप का कोल वाशरी भी अपने पूरे दम खम से लोगों की सांसों में जहर भर रहा है। दरअसल, रायगढ़ से चंद किलोमीटर के फासले पर एन एच 49 पर स्थित कुनकुनी गांव में देश के बड़े उद्योग समूह वेदांता ग्रुप ने वेदांत कोल वाशरी एंड लॉजिस्टिक प्राइवेट लिमिटेड नामक उद्योग की स्थापना की है। इस उद्योग के अंदर रेलवे की साइडिंग है जहां कोयले की डंपिंग की जाती है । यहां कोयले की जा रही डंपिंग ही लोगों के लिए जानलेवा सिद्ध हो रही है। आइए जानते हैं कि ऐसा किस वजह से हो रहा है।
*अपर्याप्त इन्फ्रास्ट्रक्चर* प्राप्त जानकारी के अनुसार वेदांत कोल वाशरी के रेलवे साइडिंग में कंक्रीटीकरण आधा अधूरा है जिसकी वजह से नीचे जमीन पर कोयले के डस्ट से कीचड़ का सैलाब सा बहता रहता है । इसी पर से बड़ी बड़ी गाड़ियां, डंपर दिन रात अनवरत कोयले की लोडिंग अनलोडिंग करते रहते हैं । नतीजा गाड़ियों के चक्कों में कोयले की डस्ट कीचड़ के रूप में लग कर बाहर एन एच तक आती है जो बाद में सूख कर जानलेवा धूल के रूप में इर्द गिर्द फैल जाती है। साथ ही सड़क भी बदहाल हो चुकी है ।

*नहीं होता है पानी का छिड़काव* नियमानुसार कोयले की धूल से बचाव के लिए प्रबंधन द्वारा पानी का नियमित छिड़काव होना चाहिए और सड़क की नियमित सफाई होनी चाहिए । पर ग्रामीणों का कहना है कि ऐसा नहीं किया जाता है । ग्रामीणों की बात में सच्चाई है क्योंकि उस क्षेत्र में थोड़ी ही देर खड़े रहने पर पूरे शरीर पर काली धूल की परत जम जाती है । और कोयले की धूल की मोटी परत आस पास के पूरे क्षेत्र में छाई हुई है।
*धूल की खौफनाक स्थिति* जब लोडिंग अनलोडिंग करनेवाले हैवी ट्रक साइडिंग से एन एच पर आते हैं तो कोयले की काली धूल का मनों तूफान उठ खड़ा होता है । तब ना केवल दृश्यता खत्म हो जाती है बल्कि आंखों में जलन और सांसों में घुटन से आस पास खड़ा रहना भी असंभव हो जाता है।
*ब्लाइंड जोन की लटकती तलवार* कंपनी प्रबंधन की असंवेदनशीलता का ये हाल है कि कंपनी द्वारा सड़क की ओर रोशनी का कोई इंतजाम नहीं किया गया है, जबकि कंपनी का फैलाव हाइवे के किनारे किनारे लगभग एक किलोमीटर तक है । इस लापरवाही का खतरा इसी से समझा जा सकता है कि गाड़ियों की आवाजाही से जब दिन में दृश्यता खत्म सी हो जाती तो रात में स्थिति कैसी भयानक होगी ! ग्रामवासियों का कहना है कि धूल और उसमें से होकर सड़क पार करना हमेशा एक खौफनाक अनुभव होता है जिसमें सांसें बस थम सी जाती है । इस जानलेवा स्थिति से ग्रामीण एक लंबे अरसे से जूझ रहे हैं, पर अब तक इस संबंध में कोई कदम नहीं उठाया गया है, ना तो कंपनी प्रबंधन द्वारा और ना ही स्थानीय प्रशासन द्वारा ।
*क्या विपक्ष उठाएगा यह मुद्दा* क्षेत्र में लगातार बढ़ते प्रदूषण से पर्यावरण संरक्षण मंडल मानों अनजान है और कुंभकर्णी नींद में सोया पड़ा है । प्रशासन भी यहां की बदहाली पर मैं साधे हुए है । ऐसे में राज्य में विधानसभा के आगामी सत्र में क्या क्षेत्र के भूतपूर्व मंत्री और खरसिया के मौजूदा विधायक उमेश पटेल विपक्ष की मजबूत , मुखर और दमदार आवाज के रूप में यह मुद्दा सदन में उठाएंगे ताकि यहां के आम लोग ताजा हवा में सांस ले सकें और रातों में चैन की नींद सो सकें ? मालूम हो कि खरसिया विधायक उमेश पटेल का गृह ग्राम नंदेली यहां से चंद किलोमीटर पर ही स्थित है और पर्यावरण वहां का भी प्रदूषित हो रहा है।



